गुरुवार, 27 नवंबर 2014
बुधवार, 26 नवंबर 2014
शनिवार, 11 अक्टूबर 2014
आलेख
बुज़ुर्गों की चिंता हाल ही में ग्लोबल एजवॉच इंडेक्स का प्रकाशन हुआ है। इसमें देशों का आंकलन इस आधार पर किया गया है कि वहां 60 व उससे अधिक उम्र के लोगों की जीवन की गुणवत्ता कैसी है। यह अध्ययन हेल्पेज इंटरनेशनल नेटवर्क द्वारा किया गया है। रिपोर्ट में अनुमान लगाया गया है कि 2050 में दुनिया की 21 प्रतिशत आबादी की उम्र 60 से अधिक होगी।
रिपोर्ट में देशों को क्रम देने के लिए 4 मापदंडों का इस्तेमाल किया गया है - आमदनी की सुरक्षा, स्वास्थ्य, व्यक्तिगत क्षमताएं और क्या व्यक्ति को जीने के लिए सामथ्र्यजनक वातावरण हासिल है। आम तौर पर माना जाता है कि वृद्ध आबादी का बढऩा रईस देशों में ही होता है मगर तथ्य यह है कि यह एक वैश्विक परिघटना है। और साथ में समस्या यह है कि गरीब देशों में वृद्ध लोगों के जीवन की गुणवत्ता काफी खस्ता होती है। नेटवर्क द्वारा प्रस्तुत इंडेक्स से अंदाजा लगता है कि आने वाले समय में लाखों वृद्धजन समस्याओं का सामना करेंगे।
दुनिया के स्तर पर देखें तो औसत आयु पिछले पचास वर्षों में बढ़कर 66 वर्ष हो गई है। उदाहरण के लिए एक सदी पहले तक जन्म के समय एक ब्रिटिश नागरिक औसतन 47 साल के जीवन की उम्मीद कर सकता था मगर आज कुछ ही देश ऐसे हैं जहां औसत आयु इतनी कम हो।
रिपार्टे के मुताबिक बुजुर्गों के लिहाज़ से सवोत्तम स्थिति नार्वे की है और उसके बाद स्वीडन और स्विटजऱलैंड का नंबर आता है। दूसरी ओर, अफगानिस्तान की हालत सबसे खराब है। इस सूची में शामिल 96 देशों में भारत का नंबर 69वां है। चिंता की बात यह है जब गरीब देशों में बुज़ुर्गों की संख्या बढ़ेगी और उनके पास आर्थिक सुरक्षा नहीं होगी तो वे अपने बच्चों पर निर्भर होंगे।
रिपोर्ट के मुताबिक निम्न और मध्यम आय वाले देशों में 65 वर्ष से अधिक आयु के मात्र 25 प्रतिशत लोगों को पेंशन मिलती है। महिलाओं की स्थिति और भी शोचनीय है क्योंकि पुरुषों के मुकाबले कम महिलाओं को पेंशन मिल पाती है। इस इंडेक्स के निर्माता सॉउथेम्पटन विवि के असगर ज़ैदी का कहना है कि हमने औसत आयु बढऩे के विभिन्न आयामों को समझने में बहुत देर कर दी है। आमतौर पर वृद्ध जनों को एक समस्या माना जाता है जबकि सही तरह का माहौल मिले तो वे समाज के लिए अच्छे संसाधन हो सकते हैं। मसलन, जर्मनी में किए गए एक अध्ययन में पता चला था कि उचित देखभाल की जाए तो वद्धृ जन समाज के लिए वरदान हो सकते हैं। बहरहाल, दुनिया की बढ़ती औसत आयु के मद्देनजऱ न सिर्फ सरकारों बल्कि समाज को भी इस बारे में सकारात्मक ढंग से सोचकर नीतियां व रीतियां बनानी होंगी। (रुाोत फीचर्स)
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